जानकी कहती हैं कि
रांची की सड़कों पर बीते दो साल में बैटरी रिक्शा की
संख्या काफ़ी बढ़ गई है जिस कारण हाल के दिनों में चालकों की कमाई में कमी
आई है.
वो कहती हैं कि "हमारे साथ रिक्शा चलाने वाले जो पुरुष
रिक्शा चालक हैं उन्हें लगता है कि हमारे रिक्शा चलाने की वजह से ही उनकी
कमाई पहले जैसी नहीं हो पा रही है."
सुमन देवी बताती हैं कि उनके काम को बुरा बोलने वाले सवारियां नहीं होती बल्कि बैटरी रिक्शा चलाने वाले पुरुष चालक होते हैं.
sex
वो कहती हैं, "सड़कों पर जितने भी रिक्शा आ जाए, किसकी कितनी कमाई होगी सब किस्मत की बात है."
संतोषी मुंडा का भी यही कहना है कि पुरुष चालक महिलाओं को अपना साथी नहीं बल्कि अपने प्रतिद्वंदी मानते हैं.
वो
कहती हैं, "ऐसा लगता है कि हम महिलाएं रिक्शा चलाकर उनके हिस्से का पैसा
ले रही हैं. जबकि मुझे लगता है कि जिसकी किस्मत में जितना होगा, उसे मिलेगा
ही."
वो कहती हैं कि ऐसी अभद्र टिप्पाणियों का जवाब देकर वो उलझना नहीं चाहती हैं इसीलिए खमोश रहना ही पसंद करती हैं.
रांची पिंक ऑटो महिला सर्विस संस्थापक संजय साहू
का मानना है कि इस काम
में महिलाओं की संख्या जितनी बढ़ेगी, लोगों की संकीर्ण मानसिकता उतनी ही
तेज़ी से बदलेगी.
वो मानते हैं कि कई बार महिला चालकों को पुरुषों के
भद्दे ताने (कमेंट) सुनने पड़ते हैं. वह कहते हैं, "कई बार महिला चालकों
पर इतनी अभद्र टिप्पणियां की जाती है कि उसे बयां तक नहीं किया जा सकता. इस
तरह की शिकायतें आम होती जा रही हैं. मैंने कई बार इसकी शिकायत पुलिस से
भी की है."
संजय साहू ने 2013 में रांची में महिलाओं के लिए अलग से
ऑटो चलाने की शुरुआत की थी. इन ऑटो की ड्राइवर और पैसेंजर दोनों ही महिलाएं
होती हैं.
रांची जिला ई-रिक्शा चालक यूनियन के अध्यक्ष दिनेश सोनी
कहते हैं कि "ये पुरुष चालक उन्हें अपना दोस्त नहीं मानता और उनके ख़िलाफ़
खड़े हो जाते हैं. ऐसे लोगों से सख्ती से निपटना ज़रूरी है."
"केवल
तीन ही तो महिलाएं हैं जो ई-रिक्शा चलाती हैं, अगर उन्हें भी इसमें
दिक्कतें आई तो आप समझ सकते हैं कि और महिलाएं आगे नहीं आएंगी, एसा नहीं
होना चाहिए."
डीज़ल-पेट्रोल की बढ़ी हुई कीमतों और
रुपए के घटते मूल्य के खिलाफ विपक्षी दलों के भारत बंद के दौरान कांग्रेस
और वाम दलों ने सोमवार को दिल्ली में अलग अलग स्थानों पर प्रदर्शन कर अपना
विरोध जताया.
कांग्रेस ने राजघाट से लेकर रामलीला मैदान तक रैली निकाली जिसका नेतृत्व पार्टी के अध्यक्ष राहुल गाँधी कर रहे थे.
कांग्रेस
के प्रदर्शन में कई और विपक्षी दल शा
मिल हुए जिनमें राष्ट्रवादी कांग्रेस
पार्टी, राष्ट्रीय जनता दल और लोकतांत्रिक जनता दल के अलावा झारखंड मुक्ति
मोर्चा और झारखंड विकास मोर्चा के प्रतिनिधि शामिल थे.
पहले आम आदमी
पार्टी ने खुद को कांग्रेस के प्रदर्शन से अलग रखने की बात कही थी. मगर आम
आदमी पार्टी के राज्य सभा के सदस्य संजय सिंह भी कांग्रेस के प्रदर्शन में
शामिल हुए.
आम आदमी पार्टी ने संसद मार्ग पर वाम दलों के प्रदर्शन में भी हिस्सा लिया.
सीताराम येचुरी, डी राजा, नीलोत्पल बसु और आम आदमी पार्टी की आतिशी ने
कई कार्यकर्ताओं के साथ संसद मार्ग पुलिस स्टेशन जाकर गिरफ्तारियां दीं.
बाद में सबको रिहा कर दिया गया.
कांग्रेस के प्रदर्शन के दौरान पूर्व प्रधनमंत्री मनमोहन सिंह और सोनिया
गांधी के अलावा शरद यादव, शरद पवार, हेमंत सोरेन, बाबूलाल मरांडी भी शामिल
थे. मगर समाजवादी पार्टी और बहुजन समाज पार्टी के नेता कांग्रेस के विरोध
प्रदर्शन से नदारद रहे.
हांलाकि वाम दलों ने अपने प्रदर्शन के दौरान
भारतीय जनता
पार्टी और कांग्रेस-दोनों को अपने निशाने पर लिया. सोशलिस्ट
यूनिटी सेंटर ऑफ़ इंडिया के रमेश शर्मा ने प्रदर्शन के दौरान बीबीसी से कहा
कि कांग्रेस और भारतीय जनता पार्टी एक ही सिक्के के दो पहलू हैं. उनका
कहना था कि दोनों ही दलों ने अपने कार्यकाल के दौरान विरोध में उठने वाले
स्वरों को कुचलने का काम किया है.
वहीं प्रदर्शन के दौरान ही
पत्रकारों से बात करते हुए मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी के महासचिव
सीताराम येचुरी का कहना था कि आम लोगों को आर्थिक मार के साथ-साथ
साम्प्रदायिकता का दंश भी झेलना पड़ रहा है. उनका कहना था कि लोगों के बीच
आक्रोश बढ़ता जा रहा है.
कांग्रेस के प्रवक्ता रणदीप सिंह सुरजेवाला ने बीबीसी से कहा कि यह
अप्रत्याशित है जब रुपया डॉलर के मुक़ाबले लुढककर 72 के पार हो गया,
पेट्रोल 83 रूपए प्रति लीटर के पार हो गया, डीज़ल 73 रूपए प्रति लीटर के
पार हो गया जबकि रसोई गैस का सिलिंडर 800 रूपए के पार हो गया.
हालांकि
कांग्रेस के शासनकाल में भी डॉलर के मुक़ाबले रुपया लुढ़का था और
पेट्रोलियम उत्पाद भी महंगे हुए थे. उस वक़्त कांग्रेस पार्टी की सरकार ने
इस
का बचाव करते हुए कहा था कि यह सब कुछ वैश्विक परिस्थितियों की वजह से हो
रहा है.
आज भारतीय जनता पार्टी भी यही कहकर अपना बचाव कर रही है.
वैसे तो दिल्ली में बंद का ख़ास असर नहीं हुआ और जन जीवन सामान्य रूप से
चलता रहा, देश के कई हिस्सों में बंद का ख़ासा प्रभाव देखा गया. वाम दलों
के नेता रमेश शर्मा का क
sex हना था कि दिल्ली में उनका प्रदर्शन सांकेतिक था.
प्रदर्शन का मक़सद था लोगों को जागरूक करना.
वहीँ दक्षिण भारतीय
राज्य तमिलनाडु में भी बंद का ज़्यादा असर नहीं देखा गया. हालांकी पूर्वी
राज्य ओडिशा में कुछ स्थानों पर कांग्रेस के कार्यकर्ता जबरन बंद कराते
नज़र आए.
भारतीय जनता पार्टी के नेता और क़ानून मंत्री रविशंकर
प्रसाद ने पत्रकारों से बात करते हुए विपक्षी दलों के भारत बंद को विफल
बताया और कहा कि देश के स्थानों पर बंद के दौरान जो हिंसक घटनाएं हुईं हैं
वो निंदनीय हैं.
भारत में अगले साल आम चुनाव होने वाले
हैं. इससे
पहले पांच राज्यों में विधानसभा चुनाव भी हैं. देश में तमाम
विपक्षी दल के ज़रिए एक महागठबंधन बनाने की बात हो रही है. इन विपक्षी दलों
में भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (मार्क्सवादी) भी अहम हिस्सा है.
पिछले
कुछ वक़्त से वामपंथी संगठनों के लाल झंडे के साथ दलित संगठनों का नीला
रंग भी शामिल हो गया है और एक नारा उभर कर आया 'जय भीम लाल सलाम', तो क्या
अब सीपीआई (एम) दलितों के मुद्दों के साथ आगे बढ़ने वाली है और आगामी
चुनावों से पहले उनकी क्या रणनीतियां हैं?
सीपीआई (एम) के महासचिव सीताराम येचुरी से पूरा साक्षात्कार यहां पढ़िए.
सवालः जो उम्मीद मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी से लोगों को है, उसे पूरा करने के लिए अगले साल होने वाले लोकसभा चुनाव को मद्देनज़र रखते हुए पार्टी का क्या रोडमैप है?
साल
2019 के चुनाव में हमें दो मुख्य चुनौतियों का सामना करना है और उनका जवाब
देना है. पहला देश की एकता और अखंडता पर सांप्रदायिक ताक़तें जिस तरह से
हमला कर रही हैं, उससे देश को बचाना बेहद ज़रूरी है.
दूसरा यह कि जिस तरह की आर्थिक नीतियां मोदी सरकार लागू कर रही है, उससे
लोग परेशान हैं. हमारे अन्नदाता, देश के किसान आत्महत्याएं कर रहे हैं.
नौजवानों के लिए हर साल दो करोड़ नौकरियों का वादा किया था, लेकिन अब तो
उल्टे लोगों के हाथों से नौकरियां जा रही हैं.
सवालः मैं
आपके रोडमैप की बात कर रहा हूं, आप राष्ट्रीय एकता अखंडता की बात कर रहे
हैं, यह नारा तो राजीव गांधी ने भी दिया था इंदिरा गांधी की हत्या के बाद.
तो आने वाले चुनाव में आपके पास नया क्या है?
नए-पुराने की
बात नहीं है. दरअसल आज के दिन देश में गरीब, दलित, अल्पसंख्यक सुरक्षित
नहीं है. इसके लिए वैकल्पिक रास्ता चाहिए, वैकल्पिक नातियां चाहिए. इसलिए
हमारा नारा है कि 'देश को नेता नहीं नीतियां चाहिए'.
इसके लिए
मौजूदा सरकार को हटाना ज़रूरी है. हमारी
पार्टी ने तय किया कि इस चुनाव में
देश में हर जगह से सांप्रदायिक ताक़तों के ख़िलाफ़ वोट को बंटने से बचाना
है.
सवालः अगर पश्चिम बंगाल की बात करें तो वहां आपके विधायकों की संख्या 44 से 5 पर आ गई. वहां आपका जो कैडर है, गांव के गांव बीजेपी में शामिल हो रहे हैं, इसको कैसे रोकेंगे.
पश्चिम
बंगाल में हमारे सामने बहुत ही गंभीर समस्या है. वहां हमारे 200 कॉमरेडों
की हत्याएं हुई हैं. ये बिलकुल ग़लत ख़बर है कि गांव के गांव छोड़कर बीजेपी
में जा रहे हैं. वहां पर लाखों वामपंथी लोग हैं जो कार्यरत हैं.
सवालः जब आपको दो तिहाई बहुमत मिलता है पश्चिम बंगाल में, उस वक्त आपके मुख्यमंत्री ऑन रिकॉर्ड टेलीविज़न इंटरव्यू में कहते हैं, कैपिटलिज़्म इज़ द ओनली वे आउट(' ') तो फिर ग़लती कहां हो गई?
इसके
बारे में पार्टी ने भी उनकी आलोचना की. ये पार्टी की राय नहीं है. ज़रूर,
एक पूंजीवादी व्यवस्था में देश है, और देश का एक हिस्
सा बंगाल भी है.
लेकिन
उसी पूंजीवादी व्यवस्था के विकल्प में वैकल्पिक नीतियां जो लागू की हैं,
वहीं बंगाल में ख़ासियत रही. फिर चाहे भूमि-सुधार की बात हो, पंचायती राज
की बात हो. ये सब बातों को छोड़कर सिर्फ़ पूंजीवाद ही एकमात्र समाधान और
रास्ता है. इसकी आलोचना पार्टी ने की है.