Friday, October 12, 2018

लड़कियों के ‘पिंजरा तोड़’ अभियान से किसे है डर

सामान्य दिनों में होने वाली हलचल की तुलना में पंजाबी यूनिवर्सिटी, पटियाला, में कुलपति का ऑफिस पहले से काफ़ी शांत था.
चंडीगढ़ से बीबीसी टीम बुधवार को वहाँ पहुँची क्योंकि यहाँ लड़कियों के हॉस्टल को 24 घंटे खोलने की मांग को लेकर पिछले तीन सप्ताह से विरोध चल रहा है. ख़ास तौर पर मंगलवार रात को हिंसा की वजह से यह और भी चर्चा में आ गया था.
वहाँ पहुँच कर देखा कि कुलपति के ऑफिस की शोभा बढ़ाने वाले गमले और गुलदस्ते टूटे पड़े थे. कुलपति के कमरे को ताला लगा दिया गया था और कुछ छात्र वहाँ बाहर धरने पर बैठे थे तो कुछ बरामदे में सो रहे थे.
वीसी ऑफिस की पहली मंजिल पर खिड़कियां तोड़ दी गईं थी. जगह जगह काँच बिखरा पड़ा था. हिंसा की वजह से दी गई छुट्टी के कारण यूनिवर्सिटी में कोई अधिकारी या शिक्षक मौजूद नहीं थे.
ऑफिस का ऐसा हाल किसने किया, किसी के पास इसका जवाब नहीं था. कुछ छात्रों ने कहा कि कुछ युवक बाहर से आए और धरने पर बैठे छात्रों पर हमला बोल दिया. जाबी यूनिवर्सिटी के छात्र 'पिंजरा तोड़' अभियान के तहत लड़कियों के हॉस्टल के 24 घंटे खुले रहने की मांग कर रहे हैं. अभी हॉस्टल 8 बजे बंद होते हैं, हालांकि लड़कों के हॉस्टल रात के 11 बजे तक खुले होते हैं.
वीसी ऑफिस के बाहर पिछले 23 दिनों से लड़कियां और उनके समर्थक धरना दे रहे थे.
यूनिवर्सिटी के पंजाबी डिपार्टमेंट के छात्र अमरदीप कौर ने कहा कि हॉस्टल की मांग को 24 घंटे की बजाय अब रात के 11 बजे तक किया गया है.
उन्होंने कहा कि लड़कों के हॉस्टल 11 बजे तक खुले हैं, इसलिए लड़कियां इस पर सहमत हो गई हैं. अमरदीप कौर ने तर्क दिया कि लड़कियों और लड़कों में समानता होनी चाहिए, "क्योंकि यूनिवर्सिटी में लड़कों की तरह हम भी फ़ीस देती हैं."
छात्र संदीप कौर का कहना है कि रात में लड़कों की तरह, वे पुस्तकालय और पढ़ने के कमरे में भी जाना चाहती हैं और आठ बजे के बाद हॉस्टल बंद हो जाता है.
उन्होंने कहा कि लड़कियों के हॉस्टल में एक कमरा है जहां एक ही समय में केवल 15 लड़कियां पढ़ाई कर सकती हैं.
एक और छात्र सुखपाल कौर ने कहा कि लड़कियों की सुरक्षा की ज़िम्मेदारी यूनिवर्सिटी की है "लेकिन दुख की बात है कि रात में परिसर में बहुत कम रोशनी होती है, सीसीटीवी कैमरों की स्थिति अच्छी नहीं है."
यूनिवर्सिटी के कुछ छात्र लड़कियों की इस मांग का ज़ोरदार विरोध कर रहे हैं.
डिफेंस स्टडीज विभाग में पीएचजी कर रहे हरविंदर संधू ने तर्क दिया, "घरों में भी आने का समय होता है और यदि हॉस्टल 24 घंटों के लिए या 11 बजे तक खुलता है, तो लड़कियों की सुरक्षा की ज़िम्मेदारी कौन लेगा." उन्होंने कहा कि "वर्तमान माहौल अच्छा नहीं है क्योंकि हर वक्त अपराध की ख़बरें सुनने को मिलती हैं."
हरविंदर सिंह ने कहा कि "कुछ छात्र इस मांग की वकालत कर रहे हैं क्योंकि उनके इसके पीछे निजी हित हैं."
हरविंदर के तर्क के साथ महिला अध्ययन विभाग के छात्र जतिंदर सिंह ने कहा कि मौजूदा स्थिति ऐसी है कि इसमें लड़के भी परिसर और आसपास के इलाक़ों में सुरक्षित नहीं हैं. उन्होंने कहा कि नौ बजे यूनिवर्सिटी परिसर की सभी दुकानें बंद हो जाती हैं और चारों तरफ़ अंधेरा हो जाता है.
"हम पटियाला के माहौल की तुलना दिल्ली या चंडीगढ़ के साथ नहीं कर सकते जहाँ लोग काफ़ी जागरूक हैं. हमारे हमारे यूनिवर्सिटी में अधिकांश छात्र ग्रामीण क्षेत्रों से आते हैं."निवर्सिटी वर्कर्स यूनियन के अध्यक्ष राजिंदर सिंह परिसर में ही रहते हैं.
उन्होंने कहा कि लड़कियों के छात्रों की मांग जायज़ नहीं है. "यूनिवर्सिटी के पार्क 'प्रेमी या लवर्ज़ पॉइंट' बन गए हैं, जो यूनिवर्सिटी के कर्मचारियों के बच्चों पर बुरा प्रभाव डालते हैं."
बीबीसी से कुछ छात्राओं ने कहा कि वो इस मांग का विरोध कर रहे हैं. पर वो नहीं चाहते हैं कि उनका नाम मीडिया में आए. उन्होंने इस मांग के विरोध का कारण महिलाओं और लड़कियों की सुरक्षा बताया.
''अगर कुछ लोग 8 बजे यूनिवर्सिटी में घुस कर हमला कर सकते हैं तो यहां कुछ भी हो सकता है.''
यूनिवर्सिटी के रजिस्ट्रार मनजीत सिंह निज्जर ने बीबीसी पंजाबी के फ़ोन पर संपर्क करने पर बताया कि यूनिवर्सिटी बंद है और वे खुद पटियाला से बाहर हैं.
नौ अक्तूबर के हमले के बाद यूनिवर्सिटी में डर का माहौल है. बड़ी संख्या में पुलिस तैनात है. 10 अक्तूबर की आधिकारिक छुट्टी के कारण यूनिवर्सिटी बंद कर दिया गया था.
कुछ छात्रों ने कहा कि यूनिवर्सिटी में कुछ लोगों की "राजनीति" उनकी शिक्षा पर विपरीत प्रभाव डाल रही है.
कुल मिलाकर यह संघर्ष फिलहाल छात्रों की शिक्षा को प्रभावित करता दिखाई दे रहा है.

Monday, October 1, 2018

德国将如何影响2017年国际气候议程?

去年11月的联合国气候大会召开时,正值美国大选尘埃落定。当特朗普获胜的消息在11月10日传至马拉喀什,与会代表们开始意识到:气候外交需要建立新的领导联盟。世界秩序已经改变,全球的目光开始投向中国。

中国政府能否拯救《巴黎协定》?他会选择谁作为自己的伙伴?中国之星正在冉冉升起,全世界都有目共睹。

几天之后,德国环境部长芭芭拉·亨德里克斯在谈判间隙赞扬了中国在此次峰会上的表现,并表示:“欧盟和中国必须站出来弥补空缺。”

老牌欧洲气候领袖

多年来,德国和包括中国在内的多个国家合作,建立了欧盟碳排放交易体系( )。作为全球首个大型碳交易市场,该体系为欧盟气候变化政策奠定了基础。中国将于今年启动全国碳排放交易计划。即便美国真的退出多边谈判,中德之间的紧密关系也将有助于构建新型气候合作伙伴的基础。

德国不仅是二十国集团( )峰会的新一任主席国,还代表《联合国气候变化框架公约》第23次缔约方会议的主办国斐济群岛在波恩组织了此次会议。作为欧洲大国,德国正在寻找一个强大的盟友。

德国政府将于今年9月迎来联邦议会选举,而6月中旬举行的G20峰会若未能取得实质性成果,或将对该国政坛产生重大影响。面对重重压力,德国能否推进其气候议程,建立新的联盟呢?

“气候总理”怎样布置G20峰会议程

一方面,德国以生态保护领导者自居,而安格拉·默克尔也继续在外交谈判中扮演着强有力的角色。如果默克尔把气候问题提上G20的讨论日程,与会各国就不得不重视。此外,适值选举年,政府会尽其所能在全国范围内塑造自己强大的形象,而气候政治向来是一招好棋。

另一方面,德国环境战略带来的变革或许并没有那么彻底;默克尔曾一度被称为“气候总理”,但事实上很多国家在这方面都已经赶超德国。默克尔政府前经济部长(近来被任命为国务秘书)西格玛尔·加布里尔多年来一直对煤炭产业维护有加,甚至在他卸任经济部长一职前的最后一个星期还在反对淘汰煤炭。因此在气候领导方面,德国当局并没有表面上看起来那么强大。

虽然德国联邦环境局( )称,德国需尽快出台具体的方案以淘汰燃煤电站,但西格玛尔·加布里尔却表示自己不想确定具体的淘汰日期。德国目前有超过140座燃煤电站仍在运营中。环境局表示,煤炭淘汰虽极具争议,但如果不这么做,德国就无法实现其在《巴黎协定》中许下的2030年气候目标。近来
政府更是承认,就连 年的气候目标或许也无法实现。

而美国未来政策的不确定性则是另一大挑战。特朗普上台后,美国可能会彻底背弃先前的气候承诺。

在德国,很多人都在试图游说政府不要主办G20峰会。去年12月,数百名反对者齐聚汉堡举行示威活动。据组织者称,此次活动是汉堡历史上规模最大的示威活动之一。

尽管存在诸多不稳定因素,非政府组织和企业代表组成的联盟预计仍将会推动碳定价的进程,将其作为达成《巴黎协定》气候目标的手段之一。

“牙齿”的国际碳定价机制

“我们希望德国政府能够把此前已经获得共识的碳定价机制提上G20日程,包括在中长期内逐步提高碳价格。此类国际统一的价格信号能够防止市场主要参与者之间出现恶性竞争,”德国工业联合会( )的霍尔格·廖什说, 代表了德国37个行业协会。

德国环境部的一位发言人表示,他们支持全球层面的碳定价,目标是在全球范围内推广这种市场机制,促进国际碳交易市场的“和谐化”。

非政府组织德国观察( )的政治主管、联盟成员克里斯托弗·巴尔斯认为,激进的二氧化碳定价计划有助于揭示温室气体排放的真实成本,可以避免重蹈欧盟碳排放交易体系的覆辙。后者的震慑力过弱,没有对投资决策产生实质性影响。

化石燃料补贴预计是峰会议程上的第二大话题。 成员国每年花费约4400亿美元支持化石燃料行业,为了在2020年之前彻底淘汰此种补贴,各国面临
压力也越来越大。

德国科学与政治基金会( )气候专家苏珊·德勒格认为,各国在削减化石燃料补贴上达成承诺的可能性要比出台碳定价机制更高,因为这对大多数国家都更有益。

德国此次主办G20峰会是国际气候政策的推进的机会。气候话题理所当然会排上议程,但主要问题在于,政治领袖们是否会讨论具体行动,而不只是停留在想法层面?之后各国是否会达成一致的决议?现在的不确定因素仍是美国总统特朗普。在6月的峰会召开之前,只有强硬的外交才能确保峰会在气候政策上取得实质性进展。